Monday, 13 April 2020

गूलर के फूल




कथित रामप्यारे ने देखे
सपने में गूलर के फूल।

स्वर्ण महल में पाया खुद को
रेशम के वस्त्रों में लकदक
रत्नजड़ित झूले पर झूलें
बीबी- बच्चे उजले झक
दुख- दर्दों के पर्वत सारे
नष्ट हो गये हैं सहमूल।

देशी और विदेशी व्यंजन
ढेरों फल, रोटी- तरकारी
दूध- दही की नदियाँ आँगन
दरवज्जे मोटर सरकारी
कदम- कदम पर अफसर नौकर
जबरन सेवा में मशगूल।

इसी बीच बच्चे रोये तो
सुंदर- सुंदर सपना टूटा
भीतर- बाहर वैसा ही था
जैसा अर्धरात में छूटा
गुदड़ी में उग आये ढेरों
पोर- पोर में चुभे बबूल।

खुद देखें या लोग दिखायें
सपने तो केवल सपने हैं
संसद में भी बुने गये जो
कागज- पत्तर ही छपने हैं
सोच- समझकर मिल को निकला
उत्तर दिशि में थूकी भूल।

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-04-2020) को   "मुस्लिम समाज को सकारात्मक सोच की आवश्यकता"   ( चर्चा अंक-3672)    पर भी होगी। -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    कोरोना को घर में लॉकडाउन होकर ही हराया जा सकता है इसलिए आप सब लोग अपने और अपनों के लिए घर में ही रहें।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. सादर धन्यवाद सर! आपका स्नेह बना रहे ��

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  3. बहुत बढ़िया

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    1. सादर धन्यवाद आपको ����

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